महाशिवरात्रि 2020: महानिशा में वैदिक विधान से महादेव के शादी की रस्में हुईं पूरी
फाल्गुन कृष्ण चतुर्दशी की चंद्रोदय व्यापिनी तीसरी महानिशा में देवाधिदेव महादेव ने संसार को नियंत्रित करने वाली आदिशक्ति देवी पार्वती का वरण किया। काशी के प्रधान शिवालय विश्वनाथ दरबार से लेकर विश्वनाथ मंदिर के पूर्व महंत के अस्थाई आवास, गौरीकेदारेश्वर, स्वयंभू तिलभांडेश्वर और जोगेश्वर महादेव मंदिर में विवाह का कर्मकांड वैदिक विधान से संपादित किया गया।
काशी के सभी प्रमुख शिवालयों में भूतभावन भोलेनाथ और भुवनस्वामिनी भवानी की लोक लीला के अंश दर्शन के लिए लालायित भक्तों की भीड़ सारी रात इन मंदिरों में जागरण करती रही। आदि योगी शिव के गृहस्थ जीवन प्रवेश का मुख्य अनुष्ठान विश्वनाथ मंदिर में हुआ। बाबा के विवाह की रस्म सप्तऋषि आरती के अर्चकों के सानिध्य में आरंभ हुई। फूलों से बना मौर बाबा को धारण कर दूल्हा बनाया गया। अरघे में एक तरफ लाल चुनरी में सजी देवी पार्वती की मूर्ति प्रतिष्ठित की गई।
विश्वनाथ मंदिर में बाबा का विवाह चार चरणों में संपादित हुआ। विवाह का प्रथम चरण पूरा होने बाद रात्रि 11 बजे से साढ़े 11 बजे तक प्रथम ऋषि आरती की गई। इसके बाद अगले तीन चरणों की रस्म पूरी होने के बाद तीन ऋषि आरतियां क्रमश:रात्रि एक से डेढ़ बजे से ढाई बजे तक, भोर में तीन से चार बजे तक और सुबह पांच से साढ़े छह बजे तक हुई। प्रत्येक आरती के दौरान बाबा के दरबार में घंटों और डमरुओं की अनुगूंज अपने चरम पर भी।
मंदिर की परंपरा के अनुसार प्रत्येक ऋषि आरती में पहले विश्वनाथ ज्योतिर्लिंग की आरती की जाती है। उसके उपरांत मंदिर के महंत आवास पर प्रतिष्ठि होने वाली शिव-पार्वती की रजत प्रतिमा की आरती की जाती है। बीते वर्ष तक आरती की प्रक्रिया में अधिक समय इसलिए नहीं लगता था कि मंदिर के ठीक सामने ही महंत आवास था। गत 22 जनवरी को महंत आवास गिर जाने के बाद महंत परिवार अस्थाई रूप से टेढ़ीनीम स्थित जालान गेस्ट हाउस में रह रहा है। हाथों में वरमाला लिए शिव-पार्वती की रजत प्रतिमा अस्थाई महंत आवास पर पूजित की गई। प्रत्येक ऋषि आरती के बाद अर्चकों को आरती लेकर टेढ़ीनीम तक आना पड़ा। मंदिर से टेढ़ीनीम आने, आरती करने और पुन: मंदिर पहुंचने के बीच बाबा के विवाह की प्रक्रिया थमी रही। इस दौरान भक्त मंगल गीत ही गाते रहे।
विश्वनाथ मंदिर के पूर्व महंत डॉ. कुलपति तिवारी के अस्थाई आवास पर मातृका पूजन से विवाह तक की परंपरा का निर्वाह हुआ। इसके बाद करीब 400 साल पुराने स्फटिक के शिवलिंग को आटे से चौका पूर कर पीतल की परात में रखा गया। इसके बाद पारंपरिक वैवाहिक गीतों की गूंज के बीच महंत पं. कुलपति तिवारी के सानिध्य में मातृका पूजन किया गया। वैदिक ब्राह्मणों द्वारा मंत्रोच्चार के बीच पूर्व महंत ने सभी देवी-देवताओं से शिव के विवाह में शामिल होने का आमंत्रण किया। महंत आवास पर बाबा के विवाह की प्रक्रिया सुबह पांच बजे पूरी हुई। गौरीकेदारेश्वर और तिलभांडेश्वर महादेव मंदिर में दक्षिण भारतीय विधान से बाबा के विवाह की रस्में पूरी की गईं। ईश्वरगंगी स्थित जोगेश्वर महादेव मंदिर में पूरी रात भक्तों ने पार्थिव शिवलिंग का अभिषेक किया।